Logo

कामाख्यापरिभाषार्थमञ्जरीसहितः श्रीमन्नागोजिभट्टविरचितः परिभाषेन्दुशेखरः

नानुबन्धकृतमसारूप्यम्

 

नन्वेवमपि 'वाऽसरूपः' इति सूत्रेण कविषयेऽणोऽप्यापत्तिरित्यत आह - 

नानुबन्धकृतमसारूप्यम्॥८॥

'ददातिदधात्योर्विभाषाइति णबाधकशस्य विकल्पविधायकमस्यां ज्ञापकम्। तेन 'गोद' इत्यादौ नाणिति 'वाऽसरूप'सूत्रे भाष्ये स्पष्टम्॥८॥

श्रीहरिशङ्करझाविरचिता कामाख्या  

कामाख्या

एकान्तपक्षे अनुबन्धसहिते बोधकतायाः स्वीकारेण काणोरसारूपत्वमिति तत्प्रवृत्तिः। ननु वासरूपसूत्रे औपदेशिकस्यासारूप्यस्य ग्रहणेऽसरूपग्रहणं व्यर्थम्। तत्र सर्वस्यैवासारूप्येण व्यावर्त्यालाभात् प्रायोगिकस्य चासारूप्यस्य लक्षणप्रवृत्तिम्विना निश्चितप्रयोगज्ञानाभावेनाज्ञानादिति चेन्न, 'मूर्तौ घन' इति घनादेशसन्नियोगशिष्टेनापा 'हलश्च वध' इति वधादेशसन्नियोगशिष्टस्यापो विकल्पेन बाधाभावायासरूपग्रहणस्य चारितार्थ्यात् । यदि च तावन्मात्रप्रयोजनकत्वे हनश्चवधोऽमूर्ताविति न्यासेन बाध्यबाधकभावाभावकल्पनान्न दोष इत्युच्यते तर्हि 'तुन्दशोकयो: परिमृजापनुदो'रितिविहितकेन इगुपधलक्षणकस्य वैकल्पिकवैकल्पिकबाधाभावाय तत्। वैकल्पिकबाधे हि विकल्पेन समासापत्तिरिति तत्त्वम्। परिभाषातः पूर्वं स्वविशिष्टत्वम् स्वसरूपत्वम्। वै. स्वघटक यावद्वृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदकधर्मवद्घटितत्व स्वटकवृत्तिश्रावणप्रत्यक्षविषयतावच्छेदक-धर्मवदघटितत्वोभयसम्बन्धेन। परिभाषाबलेन तु धर्मेऽनुबन्धावृत्तित्वन्देयमित्यन्यत् सुगममिति दिक्॥८॥

परिभाषार्थमञ्जरी

विकल्पविधायकमिति।विकल्पार्थकविभाषाघटितं सूत्रमित्यर्थः। एवञ्च विभाषाग्रहणं ज्ञापकमिति भावः। वासरूप सूत्रे इति। अत्र यद्यपि शिद्ग्रहण-माङनिर्देश विभाषाग्रहणैरनेकान्त[1]पक्षोऽपि ज्ञापयितुं शक्यस्तथापि अनेकत्रानेकलक्षणादिप्रयुक्तगौरवेणभाष्यविरोधेन चोक्त[2]ज्ञापकतैव साध्विति ध्येयम्॥८॥

[1]अनेकान्तत्वपक्ष इति के खे गे

[2]उक्तार्थज्ञापकता इति के खे गे

अनुबन्ध को एकान्त (अवयव) मानने पर एक और दोष प्रस्तुत करते हुए लिख रहे हैं -

 

नन्वेवमपि वाऽसरूपः ३.१.९४ इति सूत्रेण क-विषयेऽणोप्यापत्तिरित्यत आह -

अनुबन्ध एकान्त होते हैं अर्थात् बोधकावयव होते हैं ऐसा स्वीकार करने पर 'अनेकाल्' सूत्र में शिद ग्रहण की व्यर्थता को दूर करने के लिये 'नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम्' और 'अवदातम् ' प्रयोग को सिद्ध करने के लिये 'नानुबन्धकृतमनेजन्तत्वम्' इन परिभाषाओं को स्वीकार कर लेने पर भी इस पक्ष में एक दूसरा दोष यह उपस्थित होता है कि'कर्मण्यण्' से विहित अण प्रत्यय और 'आतो अनुपसर्गे से विहित के प्रत्यय इन दोनों प्रत्ययों में परस्पर बाध्यबाधकभावः होता है । यहाँ अण प्रत्यय वाध्य है और क प्रत्यय बाधक । इनका यह बाध्यबाधकभाव नित्य होता है जिससे 'गोद:' इत्यादि प्रयोगों में अणु को बाधकर क प्रत्यय होता है । अनुबन्ध को बोधकावयव मानने पर अणु और क प्रत्यय, दोनों असरूप प्रत्यय होंगे और असरूप प्रत्ययों का पारस्परिक बाध्यबाधकभाव 'वासरूपोऽस्त्रियाम्' सूत्र से वैकल्पिक होता है । इसलिये क प्रत्यय अण् का पाक्षिक बाधक होगा, जिससे के के विषय में अण प्रत्यय की भी आपत्ति हो सकती है । यदि कहा जाय कि प्रत्ययों की यह असरूपता प्रयोगों में ली जायेगी । अर्थात् प्रयोग में जो असरूप प्रत्यय होंगे उनका वाध्यबाधकभाव विकल्प से होगा और सरूप प्रत्ययों का नित्य होगा । अणु और क ये दोनों प्रत्यय प्रयोग में सरूप ही रहते हैं इसलिये यहाँ नित्य वाध्यबाधकभाव होगा, तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि ऐसी स्थिति में 'हनश्च वध:' इस सूत्र से विहित वयसमानाधिकरण अप् प्रत्यय का 'मूर्ती घनः' सूत्र से विहित घनसमानाधिकरण अप् प्रत्यय से वैकल्पिक वाघ होने लगेगा । क्योंकि प्रयोग में दोनों का रूप भिन्न-भिन्न है । इसलिये प्रयोग में जिनका समान रूप है उनका बाध्यबाधकभाव नित्य होता है यह कथन उचित नहीं है किन्तु सरूपता और विरूपता का आधार प्रत्ययों का उपदेशकालिक रूप ही होगा । ऐसी स्थिति में अणु और क ये दोनों प्रत्यय विरूप कहे जायेंगे; इसलिये क के द्वारा अणु का वैकल्पिक बाघ होने के कारण क के विषय में अणु की आपत्ति हो सकती है । इसलिये परिभाषा लिखी गई -

नानुबन्धकृतमसारूप्यम् ॥ ८ ॥

अनुबन्ध के कारण असरूपता नहीं होती ।

जो प्रत्यय अनुबन्ध को हटाने पर बोध्य अवस्था में समान रूप वाले हो जाते हैं वे अनुबन्धसहित बोधक स्थिति में यदि विरूप भी हैं तो उनकी यह अनुबन्धकृत विरूपता नहीं मानी जाती किन्तु वे सरूप ही कहे जाते हैं । इसका फल यह हुआ कि क और अणु प्रत्यय अपने इस रूप में विरूप होने पर भी अनुबन्ध विनिर्मुक्त होकर लक्ष्य में 'अ' रूप में ही उपस्थित होते हैं । इसलिये ये सरूप प्रत्यय हैं । इसलिये अपवादभूत के प्रत्यय से अण् प्रत्यय का नित्य बाघ होता है, जिससे क प्रत्यय के विषय में अणु प्रत्यय नहीं होता है । इस परिभाषा में प्रमाण प्रस्तुत करते हुए लिखा जा रहा है -

ददातिदधात्योर्विभाषा३.१.१३९ इति ण-बाधकशस्य विकल्पविधायकमस्यां ज्ञापकम् । तेन गोद इत्यादौ नाणिति वाऽसरूपसूत्रे भाष्ये स्पष्टम् ॥ ८ ॥

'ददातिदधात्योर्विभाषा' यह सूत्र दान् और धान् धातुओं से श प्रत्यय करता है जिससे 'दद:' और 'दधः' ये प्रयोग बनते हैं । इन प्रयोगों में 'स्याद् व्यच' इत्यादि सूत्र से नित्य ही ण प्रत्यय भी प्राप्त रहता है । इस ण प्रत्यय को 'ददातिदधात्योविभाषा' यह सूत्र विकल्प से बाघता है, जिससे पक्ष में ण प्रत्यय और युक् करके दायः, धायः ये प्रयोग बनाये जाते हैं । यहाँ प्रश्न होता है कि श और ण ये दोनों विरूप प्रत्यय हैं । इनमें श प्रत्यय ण प्रत्यय का अपवाद है । ऐसी स्थिति में 'वासरूपोऽस्त्रियाम्'' इस सूत्र से श प्रत्यय के द्वारा ण प्रत्यय का वैकल्पिक बाध सिद्ध है । इसलिये एक पक्ष में पण प्रत्यय स्वयं सिद्ध है तो उसे बाघकर श प्रत्यय का विकल्प से विधान क्यों किया गया ? यही श प्रत्यय का वैकल्पिक विधान व्यर्थ होकर इस परिभाषा का ज्ञापन करता है । परिभाषा ज्ञापित होने पर शकार और णकार जो यहाँ दो अनुबन्ध हैं इनके कारण यहाँ वैरूप्य नहीं होगा । तस्मात् दोनों प्रत्ययों में अकार अवशिष्ट रहने के कारण ये दोनों सरूप प्रत्यय हो गये । अतः यहाँ नित्य ही बाध्यबाधक होगा, जिससे यहां ण प्रत्यय नहीं हो सकता था । अतः श प्रत्यय का वैकल्पिक विधान सार्थक हुआ । इसका फल यह हुआ कि क प्रत्यय के द्वारा अग प्रत्यय का नित्यबाध होने से 'गोद:' इत्यादि प्रयोगों में अणु प्रत्यय नहीं होता ॥ ८ ॥